श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

योगेश्‍वराप्रमेयात्मन् देवदेव जगत्पते।

हन्तुं नार्हसि कल्याण भ्रातरं मे महाभुज॥ ३३

yogeśvarāprameyātman devadeva jagatpate|

hantuṃ nārhasi kalyāṇa bhrātaraṃ me mahābhuja|| 33

अर्थ

‘देवताओंके भी आराध्यदेव! जगत्पते! आप योगेश्‍वर हैं। आपके स्वरूप और इच्छाओंको कोई जान नहीं सकता। आप परम बलवान् हैं, परन्तु कल्याणस्वरूप भी तो हैं। प्रभो! मेरे भैयाको मारना आपके योग्य काम नहीं है’॥ ३३॥

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