श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

आत्ममोहो नृणामेष कल्प्यते देवमायया।

सुहृद् दुर्हृदुदासीन इति देहात्ममानिनाम्॥ ४३

ātmamoho nṛṇāmeṣa kalpyate devamāyayā|

suhṛd durhṛdudāsīna iti dehātmamāninām|| 43

अर्थ

देवि! जो लोग भगवान्‌की मायासे मोहित होकर देहको ही आत्मा मान बैठते हैं, उन्हींको ऐसा आत्ममोह होता है कि यह मित्र है, यह शत्रु है और यह उदासीन है॥ ४३॥✎ 891

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #891 शब्दोंके बीचका स्थान: होतेहैं। → होते हैं।

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