॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.54.45
देह आद्यन्तवानेष द्रव्यप्राणगुणात्मकः।
आत्मन्यविद्यया क्लृप्तः संसारयति देहिनम्॥ ४५
deha ādyantavāneṣa dravyaprāṇaguṇātmakaḥ|
ātmanyavidyayā klṛptaḥ saṃsārayati dehinam|| 45
अर्थ
यह शरीर आदि और अन्तवाला है। पञ्चभूत, पञ्चप्राण, तन्मात्रा और त्रिगुण ही इसका स्वरूप है। आत्मामें उसके अज्ञानसे ही इसकी कल्पना हुई है और वह कल्पित शरीर ही, जो उसे ‘मैं समझता है’, उसको जन्म-मृत्युके चक्करमें ले जाता है॥ ४५॥✎ 891