श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तस्मादज्ञानजं शोकमात्मशोषविमोहनम्।

तत्त्वज्ञानेन निर्हृत्य स्वस्था भव शुचिस्मिते॥ ४९

tasmādajñānajaṃ śokamātmaśoṣavimohanam|

tattvajñānena nirhṛtya svasthā bhava śucismite|| 49

अर्थ

इसलिये साध्वी! अज्ञानके कारण होनेवाले इस शोकको त्याग दो। यह शोक अन्तःकरणको मुरझा देता है, मोहित कर देता है। इसलिये इसे छोड़कर तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओ’॥ ४९॥✎ 891

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #891 शब्दोंके बीचका स्थान: होतेहैं। → होते हैं।

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