इसलिये साध्वी! अज्ञानके कारण होनेवाले इस शोकको त्याग दो। यह शोक अन्तःकरणको मुरझा देता है, मोहित कर देता है। इसलिये इसे छोड़कर तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओ’॥ ४९॥✎ 891
तस्मादज्ञानजं शोकमात्मशोषविमोहनम्।
तत्त्वज्ञानेन निर्हृत्य स्वस्था भव शुचिस्मिते॥ ४९
इसलिये साध्वी! अज्ञानके कारण होनेवाले इस शोकको त्याग दो। यह शोक अन्तःकरणको मुरझा देता है, मोहित कर देता है। इसलिये इसे छोड़कर तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओ’॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 479) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/54/49/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)