प्रद्युम्नजीके कटुवचनोंकी चोटसे शम्बरासुर तिलमिला उठा। मानो किसीने विषैले साँपको पैरसे ठोकर मार दी हो। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह हाथमें गदा लेकर बाहर निकल आया॥ १८॥
सोऽधिक्षिप्तो दुर्वचोभिः पदाहत इवोरगः।
निश्चक्राम गदापाणिरमर्षात्ताम्रलोचनः॥ १८
प्रद्युम्नजीके कटुवचनोंकी चोटसे शम्बरासुर तिलमिला उठा। मानो किसीने विषैले साँपको पैरसे ठोकर मार दी हो। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह हाथमें गदा लेकर बाहर निकल आया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 483) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/55/18/