श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तमेकदा मणिं कण्ठे प्रतिमुच्य महाप्रभम्।

प्रसेनो हयमारुह्य मृगयां व्यचरद् वने॥ १३

tamekadā maṇiṃ kaṇṭhe pratimucya mahāprabham|

praseno hayamāruhya mṛgayāṃ vyacarad vane|| 13

अर्थ

एक दिन सत्राजित्के भाई प्रसेनने उस परम प्रकाशमयी मणिको अपने गलेमें धारण कर लिया और फिर वह घोड़ेपर सवार होकर शिकार खेलने वनमें चला गया॥ १३॥

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