श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

आसीत् सत्राजितः सूर्यो भक्तस्य परमः सखा।

प्रीतस्तस्मै मणिं प्रादात् सूर्यस्तुष्टः स्यमन्तकम्॥ ३

āsīt satrājitaḥ sūryo bhaktasya paramaḥ sakhā|

prītastasmai maṇiṃ prādāt sūryastuṣṭaḥ syamantakam|| 3

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! सत्राजित् भगवान् सूर्यका बहुत बड़ा भक्त था। वे उसकी भक्तिसे प्रसन्‍न होकर उसके बहुत बड़े मित्र बन गये थे। सूर्य भगवान्‌ने ही प्रसन्‍न होकर बड़े प्रेमसे उसे स्यमन्तकमणि दी थी॥ ३॥

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