॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.56.39
स चातिव्रीडितो रत्नं गृहीत्वावाङ्मुखस्ततः।
अनुतप्यमानो भवनमगमत् स्वेन पाप्मना॥ ३९
sa cātivrīḍito ratnaṃ gṛhītvāvāṅmukhastataḥ|
anutapyamāno bhavanamagamat svena pāpmanā|| 39
अर्थ
सत्राजित् अत्यन्त लज्जित हो गया। मणि तो उसने ले ली, परन्तु उसका मुँह नीचेकी ओर लटक गया। अपने अपराधपर उसे बड़ा पश्चात्ताप हो रहा था, किसी प्रकार वह अपने घर पहुँचा॥ ३९॥