इसके बाद उन्होंने भाई-बन्धुओंके साथ अपने श्वशुर सत्राजित्की वे सब और्ध्वदैहिक क्रियाएँ करवायीं, जिनसे मृतक प्राणीका परलोक सुधरता है॥ २८॥
ततः स कारयामास क्रिया बन्धोर्हतस्य वै।
साकं सुहृद्भिर्भगवान् या याः स्युः साम्परायिकाः॥ २८
इसके बाद उन्होंने भाई-बन्धुओंके साथ अपने श्वशुर सत्राजित्की वे सब और्ध्वदैहिक क्रियाएँ करवायीं, जिनसे मृतक प्राणीका परलोक सुधरता है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.57.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 494) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/57/28/