श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

लब्ध्वैतदन्तरं राजन् शतधन्वानमूचतुः।

अक्रूरकृतवर्माणौ मणिः कस्मान्‍न गृह्यते॥ ३

labdhvaitadantaraṃ rājan śatadhanvānamūcatuḥ|

akrūrakṛtavarmāṇau maṇiḥ kasmānna gṛhyate|| 3

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णके हस्तिनापुर चले जानेसे द्वारकामें अक्रूर और कृतवर्माको अवसर मिल गया। उन लोगोंने शतधन्वासे आकर कहा—‘तुम सत्राजित्से मणि क्यों नहीं छीन लेते?॥ ३॥

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