श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

ननु दानपते न्यस्तस्त्वय्यास्ते शतधन्वना।

स्यमन्तको मणिः श्रीमान् विदितः पूर्वमेव नः॥ ३६

nanu dānapate nyastastvayyāste śatadhanvanā|

syamantako maṇiḥ śrīmān viditaḥ pūrvameva naḥ|| 36

अर्थ

‘चाचाजी! आप दान-धर्मके पालक हैं। हमें यह बात पहलेसे ही मालूम है कि शतधन्वा आपके पास वह स्यमन्तकमणि छोड़ गया है, जो बड़ी ही प्रकाशमान और धन देनेवाली है॥ ३६॥

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