वीर पाण्डवोंने भगवान् श्रीकृष्णका आलिंगन किया, उनके अंग-संगसे इनके सारे पाप-ताप धुल गये। भगवान्की प्रेमभरी मुसकराहटसे सुशोभित मुख-सुषमा देखकर वे आनन्दमें मग्न हो गये॥ ३॥
परिष्वज्याच्युतं वीरा अंगसंगहतैनसः।
सानुरागस्मितं वक्त्रं वीक्ष्य तस्य मुदं ययुः॥ ३
वीर पाण्डवोंने भगवान् श्रीकृष्णका आलिंगन किया, उनके अंग-संगसे इनके सारे पाप-ताप धुल गये। भगवान्की प्रेमभरी मुसकराहटसे सुशोभित मुख-सुषमा देखकर वे आनन्दमें मग्न हो गये॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.58.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 496) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/58/3/