श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

तं भौमः प्राहरच्छक्त्या वज्रः प्रतिहतो यतः।

नाकम्पत तया विद्धो मालाहत इव द्विपः॥ २०

taṃ bhaumaḥ prāharacchaktyā vajraḥ pratihato yataḥ|

nākampata tayā viddho mālāhata iva dvipaḥ|| 20

अर्थ

उस समय भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़जीपर सवार थे और गरुड़जी अपने पंखोंसे हाथियोंको मार रहे थे। उनकी चोंच, पंख और पंजोंकी मारसे हाथियोंको बड़ी पीड़ा हुई और वे सब-के-सब आर्त होकर युद्धभूमिसे भागकर नगरमें घुस गये। अब वहाँ अकेला भौमासुर ही लड़ता रहा। जब उसने देखा कि गरुड़जीकी मारसे पीड़ित होकर मेरी सेना भाग रही है, तब उसने उनपर वह शक्ति चलायी, जिसने वज्रको भी विफल कर दिया था। परन्तु उसकी चोटसे पक्षिराज गरुड़ तनिक भी विचलित न हुए, मानो किसीने मतवाले गजराजपर फूलोंकी मालासे प्रहार किया हो॥ १८—२०॥✎ 2115

यह अर्थ श्लोक 18–20 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2115 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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