श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

अजाय जनयित्रेऽस्य ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये।

परावरात्मन् भूतात्मन् परमात्मन् नमोऽस्तु ते॥ २८

ajāya janayitre'sya brahmaṇe'nantaśaktaye|

parāvarātman bhūtātman paramātman namo'stu te|| 28

अर्थ

आप स्वयं तो हैं जन्मरहित, परन्तु इस जगत‍्के जन्मदाता आप ही हैं। आप ही अनन्त शक्तियोंके आश्रय ब्रह्म हैं। जगत‍्का जो कुछ भी कार्य-कारणमय रूप है, जितने भी प्राणी या अप्राणी हैं— सब आपके ही स्वरूप हैं। परमात्मन्! आपके चरणोंमें मेरे बार-बार नमस्कार॥ २८॥

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