॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.59.44
इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं स्त्रियस्ता
ब्रह्मादयोऽपि न विदुः पदवीं यदीयाम्।
भेजुर्मुदाविरतमेधितयानुराग-
हासावलोकनवसंगमजल्पलज्जाः ॥ ४४
itthaṃ ramāpatimavāpya patiṃ striyastā
brahmādayo'pi na viduḥ padavīṃ yadīyām|
bhejurmudāviratamedhitayānurāga-
hāsāvalokanavasaṃgamajalpalajjāḥ || 44
अर्थ
परीक्षित्! ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवता भी भगवान्के वास्तविक स्वरूपको और उनकी प्राप्तिके मार्गको नहीं जानते। उन्हीं रमारमण भगवान् श्रीकृष्णको उन स्त्रियोंने पतिके रूपमें प्राप्त किया था। अब नित्य-निरन्तर उनके प्रेम और आनन्दकी अभिवृद्धि होती रहती थी और वे प्रेमभरी मुसकराहट, मधुर चितवन, नवसमागम, प्रेमालाप तथा भाव बढ़ानेवाली लज्जासे युक्त होकर सब प्रकारसे भगवान्की सेवा करती रहती थीं॥ ४४॥