श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

अथात्मनोऽनुरूपं वै भजस्व क्षत्रियर्षभम्।

येन त्वमाशिषः सत्या इहामुत्र च लप्स्यसे॥ १७

athātmano'nurūpaṃ vai bhajasva kṣatriyarṣabham|

yena tvamāśiṣaḥ satyā ihāmutra ca lapsyase|| 17

अर्थ

अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है। तुम अपने अनुरूप किसी श्रेष्ठ क्षत्रियको वरण कर लो। जिसके द्वारा तुम्हारी इहलोक और परलोककी सारी आशा-अभिलाषाएँ पूरी हो सकें॥ १७॥✎ 1438

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1438 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदर्भ-राजकुमारी! → विदर्भराजकुमारी!

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