कल्याणी! वे सब बल-पौरुषके मदसे अंधे हो रहे थे, अपने सामने किसीको कुछ नहीं गिनते थे। उन दुष्टोंका मान मर्दन करनेके लिये ही मैंने तुम्हारा हरण किया था और कोई कारण नहीं था॥ १९॥✎ 1438
तेषां वीर्यमदान्धानां दृप्तानां स्मयनुत्तये।
आनीतासि मया भद्रे तेजोऽपहरतासताम्॥ १९
कल्याणी! वे सब बल-पौरुषके मदसे अंधे हो रहे थे, अपने सामने किसीको कुछ नहीं गिनते थे। उन दुष्टोंका मान मर्दन करनेके लिये ही मैंने तुम्हारा हरण किया था और कोई कारण नहीं था॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 512) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1438 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदर्भ-राजकुमारी! → विदर्भराजकुमारी!