श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एतावदुक्त्वा भगवानात्मानं वल्लभामिव।

मन्यमानामविश्‍लेषात् तद्दर्पघ्न उपारमत्॥ २१

etāvaduktvā bhagavānātmānaṃ vallabhāmiva|

manyamānāmaviśleṣāt taddarpaghna upāramat|| 21

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके क्षणभरके लिये भी अलग न होनेके कारण रुक्मिणीजीको यह अभिमान हो गया था कि मैं इनकी सबसे अधिक प्यारी हूँ। इसी गर्वकी शान्तिके लिये इतना कहकर भगवान् चुप हो गये॥ २१॥

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