॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.60.34
रुक्मिण्युवाच
नन्वेवमेतदरविन्दविलोचनाह
यद् वै भवान् भगवतोऽसदृशी विभूम्नः।
क्व स्वे महिम्न्यभिरतो भगवांस्त्र्यधीशः ✎ 2120
क्वाहं गुणप्रकृतिरज्ञगृहीतपादा॥ ३४
nanvevametadaravindavilocanāha
yad vai bhavān bhagavato'sadṛśī vibhūmnaḥ|
kva sve mahimnyabhirato bhagavāṃstryadhīśaḥ
kvāhaṃ guṇaprakṛtirajñagṛhītapādā|| 34
अर्थ
रुक्मिणीजीने कहा—कमलनयन! आपका यह कहना ठीक है कि ऐश्वर्य आदि समस्त गुणोंसे युक्त, अनन्त भगवान्के अनुरूप मैं नहीं हूँ। आपकी समानता मैं किसी प्रकार नहीं कर सकती। कहाँ तो अपनी अखण्ड महिमामें स्थित, तीनों गुणोंके स्वामी तथा ब्रह्मा आदि देवताओंसे सेवित आप भगवान्; और कहाँ तीनों गुणोंके अनुसार स्वभाव रखनेवाली गुणमयी प्रकृति मैं, जिसकी सेवा कामनाओंके पीछे भटकनेवाले अज्ञानी लोग ही करते हैं॥ ३४॥