॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.60.37
निष्किंचनो ननु भवान् न यतोऽस्ति किंचिद्
यस्मै बलिं बलिभुजोऽपि हरन्त्यजाद्याः।
न त्वा विदन्त्यसुतृपोऽन्तकमाढ्यतान्धाः
प्रेष्ठो भवान् बलिभुजामपि तेऽपि तुभ्यम्॥ ३७
niṣkiṃcano nanu bhavān na yato'sti kiṃcid
yasmai baliṃ balibhujo'pi harantyajādyāḥ|
na tvā vidantyasutṛpo'ntakamāḍhyatāndhāḥ
preṣṭho bhavān balibhujāmapi te'pi tubhyam|| 37
अर्थ
आपने अपनेको अकिंचन बतलाया है; परन्तु आपकी अकिंचनता दरिद्रता नहीं है। उसका अर्थ यह है कि आपके अतिरिक्त और कोई वस्तु न होनेके कारण आप ही सब कुछ हैं। आपके पास रखनेके लिये कुछ नहीं है। परन्तु जिन ब्रह्मा आदि देवताओंकी पूजा सब लोग करते हैं, भेंट देते हैं, वे ही लोग आपकी पूजा करते रहते हैं। आप उनके प्यारे हैं और वे आपके प्यारे हैं। (आपका यह कहना भी सर्वथा उचित है कि धनाढ्य लोग मेरा भजन नहीं करते;) जो लोग अपनी धनाढ्यताके अभिमानसे अंधे हो रहे हैं और इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें ही लगे हैं, वे न तो आपका भजन-सेवन ही करते और न तो यह जानते हैं कि आप मृत्युके रूपमें उनके सिरपर सवार हैं॥ ३७॥