॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.60.44
तस्याः स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टाः
स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वबिडालभृत्याः।
यत्कर्णमूलमरिकर्षण नोपयायाद्
युष्मत्कथा मृडविरिंचसभासु गीता॥ ४४
tasyāḥ syuracyuta nṛpā bhavatopadiṣṭāḥ
strīṇāṃ gṛheṣu kharagośvabiḍālabhṛtyāḥ|
yatkarṇamūlamarikarṣaṇa nopayāyād
yuṣmatkathā mṛḍaviriṃcasabhāsu gītā|| 44
अर्थ
अच्युत! शत्रुसूदन! गधोंके समान घरका बोझा ढोनेवाले, बैलोंके समान गृहस्थीके व्यापारोंमें जुते रहकर कष्ट उठानेवाले, कुत्तोंके समान तिरस्कार सहनेवाले, बिलावके समान कृपण और हिंसक तथा क्रीत दासोंके समान स्त्रीकी सेवा करनेवाले शिशुपाल आदि राजालोग, जिन्हें वरण करनेके लिये आपने मुझे संकेत किया है—उसी अभागिनी स्त्रीके पति हों, जिनके कानोंमें भगवान् शंकर, ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंकी सभामें गायी जानेवाली आपकी लीलाकथाने प्रवेश नहीं किया है॥ ४४॥