श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.48

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

व्यूढायाश्‍चापि पुंश्‍चल्या मनोऽभ्येति नवं नवम्।

बुधोऽसतीं न बिभृयात् तां बिभ्रदुभयच्युतः॥ ४८

vyūḍhāyāścāpi puṃścalyā mano'bhyeti navaṃ navam|

budho'satīṃ na bibhṛyāt tāṃ bibhradubhayacyutaḥ|| 48

अर्थ

कुलटा स्त्रीका मन तो विवाह हो जानेपर भी नये-नये पुरुषोंकी ओर खिंचता रहता है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह ऐसी कुलटा स्त्रीको अपने पास न रखे। उसे अपनानेवाला पुरुष लोक और परलोक दोनों खो बैठता है, उभयभ्रष्ट हो जाता है॥ ४८॥

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