श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

मां प्राप्य मानिन्यपवर्गसम्पदं

वाञ्छन्ति ये सम्पद एव तत्पतिम्।

ते मन्दभाग्या निरयेऽपि ये नृणां ✎ 1181

मात्रात्मकत्वान्‍निरयः सुसंगमः॥ ५३

māṃ prāpya māninyapavargasampadaṃ

vāñchanti ye sampada eva tatpatim|

te mandabhāgyā niraye'pi ye nṛṇāṃ

mātrātmakatvānnirayaḥ susaṃgamaḥ|| 53

अर्थ

मानिनी प्रिये! मैं मोक्ष तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंका आश्रय हूँ, अधीश्‍वर हूँ। मुझ परमात्माको प्राप्त करके भी जो लोग केवल विषयसुखके साधन सम्पत्तिकी ही अभिलाषा करते हैं, मेरी पराभक्ति नहीं चाहते, वे बड़े मन्दभागी हैं, क्योंकि विषयसुख तो नरकमें और नरकके ही समान सूकर-कूकर आदि योनियोंमें भी प्राप्त हो सकते हैं। परन्तु उन लोगोंका मन तो विषयोंमें ही लगा रहता है, इसलिये उन्हें नरकमें जाना भी अच्छा जान पड़ता है॥ ५३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1181 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

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