श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.61.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 61 · अथैकषष्टितमोऽध्यायः

स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि-

भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डैः ।

पत्‍न्यस्तु षोडशसहस्रमनंगबाणै-

र्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न शेकुः॥ ४

smāyāvalokalavadarśitabhāvahāri-

bhrūmaṇḍalaprahitasauratamantraśauṇḍaiḥ |

patnyastu ṣoḍaśasahasramanaṃgabāṇai-

ryasyendriyaṃ vimathituṃ karaṇairna śekuḥ|| 4

अर्थ

वे सोलह हजारसे अधिक थीं। अपनी मन्द-मन्द मुसकान और तिरछी चितवनसे युक्त मनोहर भौंहोंके इशारेसे ऐसे प्रेमके बाण चलाती थीं, जो काम-कलाके भावोंसे परिपूर्ण होते थे, परन्तु किसी भी प्रकारसे, किन्हीं साधनोंके द्वारा वे भगवान्‌के मन एवं इन्द्रियोंमें चंचलता नहीं उत्पन्‍न कर सकीं॥ ४॥

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