श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

सा च तं सुन्दरवरं विलोक्य मुदितानना।

दुष्प्रेक्ष्ये स्वगृहे पुम्भी रेमे प्राद्युम्‍निना समम्॥ २४

sā ca taṃ sundaravaraṃ vilokya muditānanā|

duṣprekṣye svagṛhe pumbhī reme prādyumninā samam|| 24

अर्थ

अपने परम सुन्दर प्राणवल्लभको पाकर आनन्दकी अधिकतासे उसका मुखकमल प्रफुल्लित हो उठा और वह अनिरुद्धजीके साथ अपने महलमें विहार करने लगी। परीक्षित्! उसका अन्तःपुर इतना सुरक्षित था कि उसकी ओर कोई पुरुष झाँकतक नहीं सकता था॥ २४॥✎ 1697

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1697 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्राण-वल्लभको → प्राणवल्लभको

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