॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.63.26
कालो दैवं कर्म जीवः स्वभावो
द्रव्यं क्षेत्रं प्राण आत्मा विकारः।
तत्संघातो बीजरोहप्रवाह-
स्त्वन्मायैषा तन्निषेधं प्रपद्ये॥ २६
kālo daivaṃ karma jīvaḥ svabhāvo
dravyaṃ kṣetraṃ prāṇa ātmā vikāraḥ|
tatsaṃghāto bījarohapravāha-
stvanmāyaiṣā tanniṣedhaṃ prapadye|| 26
अर्थ
काल, दैव (अदृष्ट), कर्म, जीव, स्वभाव, सूक्ष्मभूत, शरीर, सूत्रात्मा प्राण, अहंकार, एकादश इन्द्रियाँ और पंचभूत—इन सबका संघात लिंगशरीर और बीजांकुर-न्यायके अनुसार उससे कर्म और कर्मसे फिर लिंग-शरीरकी उत्पत्ति—यह सब आपकी माया है। आप मायाके निषेधकी परम अवधि हैं। मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ २६॥