श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.63.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 63 · अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः

नाभिर्नभोऽग्‍निर्मुखमम्बु रेतो

द्यौः शीर्षमाशा श्रुतिरङ्‌घ्रिरुर्वी।

चन्द्रो मनो यस्य दृगर्क आत्मा

अहं समुद्रो जठरं भुजेन्द्रः॥ ३५

nābhirnabho'gnirmukhamambu reto

dyauḥ śīrṣamāśā śrutiraṅghrirurvī|

candro mano yasya dṛgarka ātmā

ahaṃ samudro jaṭharaṃ bhujendraḥ|| 35

अर्थ

आकाश आपकी नाभि है, अग्‍नि मुख है और जल वीर्य। स्वर्ग सिर, दिशाएँ कान और पृथ्वी चरण है। चन्द्रमा मन, सूर्य नेत्र और मैं शिव आपका अहंकार हूँ। समुद्र आपका पेट है और इन्द्र भुजा॥ ३५॥

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