श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.63.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 63 · अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः

देवदत्तमिमं लब्ध्वा नृलोकमजितेन्द्रियः।

यो नाद्रियेत त्वत्पादौ स शोच्यो ह्यात्मवंचकः॥ ४१

devadattamimaṃ labdhvā nṛlokamajitendriyaḥ|

yo nādriyeta tvatpādau sa śocyo hyātmavaṃcakaḥ|| 41

अर्थ

संसारके मानवोंको यह मनुष्य-शरीर आपने अत्यन्त कृपा करके दिया है। जो पुरुष इसे पाकर भी अपनी इन्द्रियोंको वशमें नहीं करता और आपके चरणकमलोंका आश्रय नहीं लेता—उनका सेवन नहीं करता, उसका जीवन अत्यन्त शोचनीय है और वह स्वयं अपने-आपको धोखा दे रहा है॥ ४१॥

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