श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.63.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 63 · अथ त्रिषष्टितमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

यदात्थ भगवंस्त्वन्‍नः करवाम प्रियं तव।

भवतो यद् व्यवसितं तन्मे साध्वनुमोदितम्॥ ४६

yadāttha bhagavaṃstvannaḥ karavāma priyaṃ tava|

bhavato yad vyavasitaṃ tanme sādhvanumoditam|| 46

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—भगवन्! आपकी बात मानकर—जैसा आप चाहते हैं, मैं इसे निर्भय किये देता हूँ। आपने पहले इसके सम्बन्धमें जैसा निश्‍चय किया था—मैंने इसकी भुजाएँ काटकर उसीका अनुमोदन किया है॥ ४६॥ मैं जानता हूँ कि बाणासुर दैत्यराज बलिका पुत्र है। इसलिये मैं भी इसका वध नहीं कर सकता; क्योंकि मैंने प्रह्लादको वर दे दिया है कि मैं तुम्हारे वंशमें पैदा होनेवाले किसी भी दैत्यका वध नहीं करूँगा॥ ४७॥ इसका घमंड चूर करनेके लिये ही मैंने इसकी भुजाएँ काट दी हैं। इसकी बहुत बड़ी सेना पृथ्वीके लिये भार हो रही थी, इसीलिये मैंने उसका संहार कर दिया है॥ ४८॥ अब इसकी चार भुजाएँ बच रही हैं। ये अजर, अमर बनी रहेंगी। यह बाणासुर आपके पार्षदोंमें मुख्य होगा। अब इसको किसीसे किसी प्रकारका भय नहीं है॥ ४९॥

यह व्याख्या श्लोक 10.63.46 से 10.63.49 तककी एक साथ है।

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