श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

नाहं प्रतीच्छे वै राजन्‍नित्युक्त्वा स्वाम्यपाक्रमत्।

नान्यद् गवामप्ययुतमिच्छामीत्यपरो ययौ॥ २१

nāhaṃ pratīcche vai rājannityuktvā svāmyapākramat|

nānyad gavāmapyayutamicchāmītyaparo yayau|| 21

अर्थ

‘राजन्! मैं इसके बदलेमें कुछ नहीं लूँगा।’ यह कहकर गायका स्वामी चला गया। ‘तुम इसके बदलेमें एक लाख ही नहीं, दस हजार गौएँ और दो तो भी मैं लेनेका नहीं।’ इस प्रकार कहकर दूसरा ब्राह्मण भी चला गया॥ २१॥

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