श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

हिनस्ति विषमत्तारं वह्निरद्भिः प्रशाम्यति।

कुलं समूलं दहति ब्रह्मस्वारणिपावकः॥ ३४

hinasti viṣamattāraṃ vahniradbhiḥ praśāmyati|

kulaṃ samūlaṃ dahati brahmasvāraṇipāvakaḥ|| 34

अर्थ

हलाहल विष केवल खानेवालेका ही प्राण लेता है और आग भी जलके द्वारा बुझायी जा सकती है; परन्तु ब्राह्मणके धनरूप अरणिसे जो आग पैदा होती है, वह सारे कुलको समूल जला डालती है॥ ३४॥✎ 1698 2124 2125 2126

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1698 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बहु-कुटुम्बी → बहुकुटुम्बी
  • #2124 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2125 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2126 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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