हलाहल विष केवल खानेवालेका ही प्राण लेता है और आग भी जलके द्वारा बुझायी जा सकती है; परन्तु ब्राह्मणके धनरूप अरणिसे जो आग पैदा होती है, वह सारे कुलको समूल जला डालती है॥ ३४॥✎ 1698212421252126
हिनस्ति विषमत्तारं वह्निरद्भिः प्रशाम्यति।
कुलं समूलं दहति ब्रह्मस्वारणिपावकः॥ ३४
हलाहल विष केवल खानेवालेका ही प्राण लेता है और आग भी जलके द्वारा बुझायी जा सकती है; परन्तु ब्राह्मणके धनरूप अरणिसे जो आग पैदा होती है, वह सारे कुलको समूल जला डालती है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 540) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)