श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.64.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 64 · अथ चतुःषष्टितमोऽध्यायः

राजानो राजलक्ष्म्यान्धा नात्मपातं विचक्षते।

निरयं येऽभिमन्यन्ते ब्रह्मस्वं साधु बालिशाः॥ ३६

rājāno rājalakṣmyāndhā nātmapātaṃ vicakṣate|

nirayaṃ ye'bhimanyante brahmasvaṃ sādhu bāliśāḥ|| 36

अर्थ

जो मूर्ख राजा अपनी राजलक्ष्मीके घमंडसे अंधे होकर ब्राह्मणोंका धन हड़पना चाहते हैं, समझना चाहिये कि वे जान-बूझकर नरकमें जानेका रास्ता साफ कर रहे हैं। वे देखते नहीं कि उन्हें अधःपतनके कैसे गहरे गड्ढेमें गिरना पड़ेगा॥ ३६॥✎ 1698 2124 2125 2126

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1698 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बहु-कुटुम्बी → बहुकुटुम्बी
  • #2124 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2125 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि
  • #2126 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ढि़ → ढ़ि

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