जो मनुष्य अपनी या दूसरोंकी दी हुई ब्राह्मणोंकी वृत्ति, उनकी जीविकाके साधन छीन लेते हैं, वे साठ हजार वर्षतक विष्ठाके कीड़े होते हैं॥ ३९॥✎ 1698212421252126
स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्तिं हरेच्च यः।
षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः॥ ३९
जो मनुष्य अपनी या दूसरोंकी दी हुई ब्राह्मणोंकी वृत्ति, उनकी जीविकाके साधन छीन लेते हैं, वे साठ हजार वर्षतक विष्ठाके कीड़े होते हैं॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.64.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 541) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/64/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)