श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.65.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 65 · अथ पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

द्वौ मासौ तत्र चावात्सीन्मधुं माधवमेव च।

रामः क्षपासु भगवान् गोपीनां रतिमावहन्॥ १७

dvau māsau tatra cāvātsīnmadhuṃ mādhavameva ca|

rāmaḥ kṣapāsu bhagavān gopīnāṃ ratimāvahan|| 17

अर्थ

और वसन्तके दो महीने—चैत्र और वैशाख वहीं बिताये। वे रात्रिके समय गोपियोंमें रहकर उनके प्रेमकी अभिवृद्धि करते। क्यों न हो, भगवान् राम ही जो ठहरे!॥ १७॥

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