गलेमें पुष्पोंका हार शोभा पा रहा था। वैजयन्तीकी माला पहने हुए आनन्दोन्मत्त हो रहे थे। उनके एक कानमें कुण्डल झलक रहा था। मुखारविन्दपर मुसकराहटकी शोभा निराली ही थी। उसपर पसीनेकी बूँदें हिमकणके समान जान पड़ती थीं॥ २२॥
स्रग्व्येककुण्डलो मत्तो वैजयन्त्या च मालया।
बिभ्रत् स्मितमुखाम्भोजं स्वेदप्रालेयभूषितम्॥ २२
गलेमें पुष्पोंका हार शोभा पा रहा था। वैजयन्तीकी माला पहने हुए आनन्दोन्मत्त हो रहे थे। उनके एक कानमें कुण्डल झलक रहा था। मुखारविन्दपर मुसकराहटकी शोभा निराली ही थी। उसपर पसीनेकी बूँदें हिमकणके समान जान पड़ती थीं॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.65.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 544) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/65/22/