भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार पौण्ड्रकका तिरस्कार करके अपने तीखे बाणोंसे उसके रथको तोड़-फोड़ डाला और चक्रसे उसका सिर वैसे ही उतार लिया, जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे पहाड़की चोटियोंको उड़ा दिया था॥ २१॥
इति क्षिप्त्वा शितैर्बाणैर्विरथीकृत्य पौण्ड्रकम्।
शिरोऽवृश्चद् रथांगेन वज्रेणेन्द्रो यथा गिरेः॥ २१
भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार पौण्ड्रकका तिरस्कार करके अपने तीखे बाणोंसे उसके रथको तोड़-फोड़ डाला और चक्रसे उसका सिर वैसे ही उतार लिया, जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे पहाड़की चोटियोंको उड़ा दिया था॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 548) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/66/21/