॥ श्रीहरिः ॥
शिरः पतितमालोक्य राजद्वारे सकुण्डलम्।
किमिदं कस्य वा वक्त्रमिति संशिश्यिरे जनाः॥ २५
śiraḥ patitamālokya rājadvāre sakuṇḍalam|
kimidaṃ kasya vā vaktramiti saṃśiśyire janāḥ|| 25
अर्थ
इधर काशीमें राजमहलके दरवाजेपर एक कुण्डल-मण्डित मुण्ड गिरा देखकर लोग तरह-तरहका सन्देह करने लगे और सोचने लगे कि ‘यह क्या है, यह किसका सिर है?’॥ २५॥
शिरः पतितमालोक्य राजद्वारे सकुण्डलम्।
किमिदं कस्य वा वक्त्रमिति संशिश्यिरे जनाः॥ २५
इधर काशीमें राजमहलके दरवाजेपर एक कुण्डल-मण्डित मुण्ड गिरा देखकर लोग तरह-तरहका सन्देह करने लगे और सोचने लगे कि ‘यह क्या है, यह किसका सिर है?’॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.66.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 548) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/66/25/