॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.67.1
अथ सप्तषष्टितमोऽध्यायः
द्विविदका उद्धार
राजोवाच
भूयोऽहं श्रोतुमिच्छामि रामस्याद्भुतकर्मणः।
अनन्तस्याप्रमेयस्य यदन्यत् कृतवान् प्रभुः॥ १
bhūyo'haṃ śrotumicchāmi rāmasyādbhutakarmaṇaḥ|
anantasyāprameyasya yadanyat kṛtavān prabhuḥ|| 1
अर्थ
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवान् बलरामजी सर्वशक्तिमान् एवं सृष्टि-प्रलयकी सीमासे परे, अनन्त हैं। उनका स्वरूप, गुण, लीला आदि मन, बुद्धि और वाणीके विषय नहीं हैं। उनकी एक-एक लीला लोकमर्यादासे विलक्षण है, अलौकिक है। उन्होंने और जो कुछ अद्भुत कर्म किये हों, उन्हें मैं फिर सुनना चाहता हूँ॥ १॥