॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.67.3
सख्युः सोऽपचितिं कुर्वन् वानरो राष्ट्रविप्लवम्।
पुरग्रामाकरान् घोषानदहद् वह्निमुत्सृजन्॥ ३
sakhyuḥ so'pacitiṃ kurvan vānaro rāṣṭraviplavam|
puragrāmākarān ghoṣānadahad vahnimutsṛjan|| 3
अर्थ
जब उसने सुना कि श्रीकृष्णने भौमासुरको मार डाला, तब वह अपने मित्रकी मित्रताके ऋणसे उऋण होनेके लिये राष्ट्र-विप्लव करनेपर उतारू हो गया। वह वानर बड़े-बड़े नगरों, गाँवों, खानों और अहीरोंकी बस्तियोंमें आग लगाकर उन्हें जलाने लगा॥ ३॥