द्विविद वानरमें दस हजार हाथियोंका बल था। कभी-कभी वह दुष्ट समुद्रमें खड़ा हो जाता और हाथोंसे इतना जल उछालता कि समुद्रतटके देश डूब जाते॥ ५॥
क्वचित् समुद्रमध्यस्थो दोर्भ्यामुत्क्षिप्य तज्जलम्।
देशान् नागायुतप्राणो वेलाकूलानमज्जयत्॥ ५
द्विविद वानरमें दस हजार हाथियोंका बल था। कभी-कभी वह दुष्ट समुद्रमें खड़ा हो जाता और हाथोंसे इतना जल उछालता कि समुद्रतटके देश डूब जाते॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 551) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/67/5/