इस प्रकार वह देशवासियोंका तो तिरस्कार करता ही, कुलीन स्त्रियोंको भी दूषित कर देता था। एक दिन वह दुष्ट सुललित संगीत सुनकर रैवतक पर्वतपर गया॥ ८॥
एवं देशान् विप्रकुर्वन् दूषयंश्च कुलस्त्रियः।
श्रुत्वा सुललितं गीतं गिरिं रैवतकं ययौ॥ ८
इस प्रकार वह देशवासियोंका तो तिरस्कार करता ही, कुलीन स्त्रियोंको भी दूषित कर देता था। एक दिन वह दुष्ट सुललित संगीत सुनकर रैवतक पर्वतपर गया॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.67.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 551) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/67/8/