श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

बध्नीतेमं दुर्विनीतं किं करिष्यन्ति वृष्णयः।

येऽस्मत्प्रसादोपचितां दत्तां नो भुंजते महीम्॥ ३

badhnītemaṃ durvinītaṃ kiṃ kariṣyanti vṛṣṇayaḥ|

ye'smatprasādopacitāṃ dattāṃ no bhuṃjate mahīm|| 3

अर्थ

अतः इस ढीठको पकड़कर बाँध लो। यदि यदुवंशीलोग रुष्ट भी होंगे तो वे हमारा क्या बिगाड़ लेंगे? वे लोग हमारी ही कृपासे हमारी ही दी हुई धन-धान्यसे परिपूर्ण पृथ्वीका उपभोग कर रहे हैं॥ ३॥✎ 1701

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1701 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जाम्बवती-नन्दन → जाम्बवतीनन्दन

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