श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

यस्याङ्‌घ्रिपंकजरजोऽखिललोकपालै- ✎ 1842

र्मौल्युत्तमैर्धृतमुपासिततीर्थतीर्थम्।

ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य कलाः कलायाः

श्रीश्‍चोद्वहेम चिरमस्य नृपासनं क्व॥ ३७

yasyāṅghripaṃkajarajo'khilalokapālai-

rmaulyuttamairdhṛtamupāsitatīrthatīrtham|

brahmā bhavo'hamapi yasya kalāḥ kalāyāḥ

śrīścodvahema ciramasya nṛpāsanaṃ kva|| 37

अर्थ

ठीक है भाई! जिनके चरण-कमलोंकी धूल संत पुरुषोंके द्वारा सेवित गंगा आदि तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाली है, सारे लोकपाल अपने-अपने श्रेष्ठ मुकुटपर जिनके चरणकमलोंकी धूल धारण करते हैं; ब्रह्मा, शंकर, मैं और लक्ष्मीजी जिनकी कलाकी भी कला हैं और जिनके चरणोंकी धूल सदा-सर्वदा धारण करते हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णके लिये भला; राजसिंहासन कहाँ रखा है!॥ ३७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1842 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ऽखिललोकपालै → ऽखिललोकपालै-

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें