श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कौरवोंका नगर डगमगा रहा था और वे अत्यन्त घबराहटमें पड़े हुए थे। जब सब-के-सब कुरुवंशी इस प्रकार भगवान् बलरामजीकी शरणमें आये और उनकी स्तुति-प्रार्थना की, तब वे प्रसन्न हो गये और ‘डरो मत’ ऐसा कहकर उन्हें अभयदान दिया॥ ४९॥
एवं प्रपन्नैः संविग्नैर्वेपमानायनैर्बलः।
प्रसादितः सुप्रसन्नो मा भैष्टेत्यभयं ददौ॥ ४९
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कौरवोंका नगर डगमगा रहा था और वे अत्यन्त घबराहटमें पड़े हुए थे। जब सब-के-सब कुरुवंशी इस प्रकार भगवान् बलरामजीकी शरणमें आये और उनकी स्तुति-प्रार्थना की, तब वे प्रसन्न हो गये और ‘डरो मत’ ऐसा कहकर उन्हें अभयदान दिया॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.68.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 559) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/68/49/