कहीं श्रेष्ठ यादवोंसे घिरे हुए सिन्धुदेशीय घोड़ेपर चढ़कर मृगया कर रहे हैं, इस प्रकार यज्ञके लिये मेध्य पशुओंका संग्रह कर रहे हैं॥ ३५॥
चरन्तं मृगयां क्वापि हयमारुह्य सैन्धवम्।
घ्नन्तं ततः पशून् मेध्यान् परीतं यदुपुंगवैः॥ ३५
कहीं श्रेष्ठ यादवोंसे घिरे हुए सिन्धुदेशीय घोड़ेपर चढ़कर मृगया कर रहे हैं, इस प्रकार यज्ञके लिये मेध्य पशुओंका संग्रह कर रहे हैं॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.69.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 565) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/69/35/