श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.69.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 69 · अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः

एवं मनुष्यपदवीमनुवर्तमानो

नारायणोऽखिलभवाय गृहीतशक्तिः।

रेमेऽङ्ग षोडशसहस्रवरांगनानां

सव्रीडसौहृदनिरीक्षणहासजुष्टः॥ ४४

evaṃ manuṣyapadavīmanuvartamāno

nārāyaṇo'khilabhavāya gṛhītaśaktiḥ|

reme'ṅga ṣoḍaśasahasravarāṃganānāṃ

savrīḍasauhṛdanirīkṣaṇahāsajuṣṭaḥ|| 44

अर्थ

राजन्! भगवान् नारायण सारे जगत‍्के कल्याणके लिये अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाको स्वीकार करते हैं और इस प्रकार मनुष्योंकी-सी लीला करते हैं। द्वारकापुरीमें सोलह हजारसे भी अधिक पत्‍नियाँ अपनी सलज्ज एवं प्रेमभरी चितवन तथा मन्द-मन्द मुसकानसे उनकी सेवा करती थीं और वे उनके साथ विहार करते थे॥ ४४॥

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