उस समय पारिजातकी सुगन्धसे सुवासित भीनी-भीनी वायु बहने लगती। भौंरे तालस्वरसे अपने संगीतकी तान छेड़ देते। पक्षियोंकी नींद उचट जाती और वे वंदीजनोंकी भाँति भगवान् श्रीकृष्णको जगानेके लिये मधुर स्वरसे कलरव करने लगते॥ २॥
वयांस्यरूरुवन् कृष्णं बोधयन्तीव वन्दिनः।
गायत्स्वलिष्वनिद्राणि मन्दारवनवायुभिः॥ २
उस समय पारिजातकी सुगन्धसे सुवासित भीनी-भीनी वायु बहने लगती। भौंरे तालस्वरसे अपने संगीतकी तान छेड़ देते। पक्षियोंकी नींद उचट जाती और वे वंदीजनोंकी भाँति भगवान् श्रीकृष्णको जगानेके लिये मधुर स्वरसे कलरव करने लगते॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.70.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 566) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/70/2/