॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.70.27
लोके भवांजगदिनः कलयावतीर्णः
सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय चान्यः।
कश्चित् त्वदीयमतियाति निदेशमीश
किं वा जनः स्वकृतमृच्छति तन्न विद्मः॥ २७
loke bhavāṃjagadinaḥ kalayāvatīrṇaḥ
sadrakṣaṇāya khalanigrahaṇāya cānyaḥ|
kaścit tvadīyamatiyāti nideśamīśa
kiṃ vā janaḥ svakṛtamṛcchati tanna vidmaḥ|| 27
अर्थ
आप स्वयं जगदीश्वर हैं और आपने जगत्में अपने ज्ञान, बल आदि कलाओंके साथ इसलिये अवतार ग्रहण किया है कि संतोंकी रक्षा करें और दुष्टोंको दण्ड दें। ऐसी अवस्थामें प्रभो! जरासन्ध आदि कोई दूसरे राजा आपकी इच्छा और आज्ञाके विपरीत हमें कैसे कष्ट दे रहे हैं, यह बात हमारी समझमें नहीं आती। यदि यह कहा जाय कि जरासन्ध हमें कष्ट नहीं देता, उसके रूपमें—उसे निमित्त बनाकर हमारे अशुभ कर्म ही हमें दुःख पहुँचा रहे हैं; तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि जब हमलोग आपके अपने हैं, तब हमारे दुष्कर्म हमें फल देनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं? इसलिये आप कृपा करके अवश्य ही हमें इस क्लेशसे मुक्त कीजिये॥ २७॥✎ 1707