श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.70.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 70 · अथ सप्ततितमोऽध्यायः

यो वै त्वया द्विनवकृत्व उदात्तचक्र

भ‌ग्‍नो मृधे खलु भवन्तमनन्तवीर्यम्।

जित्वा नृलोकनिरतं सकृदूढदर्पो

युष्मत्प्रजा रुजति नोऽजित तद् विधेहि॥ ३०

yo vai tvayā dvinavakṛtva udāttacakra

bhagno mṛdhe khalu bhavantamanantavīryam|

jitvā nṛlokanirataṃ sakṛdūḍhadarpo

yuṣmatprajā rujati no'jita tad vidhehi|| 30

अर्थ

चक्रपाणे! आपने अठारह बार जरासन्धसे युद्ध किया और सत्रह बार उसका मान-मर्दन करके उसे छोड़ दिया। परन्तु एक बार उसने आपको जीत लिया। हम जानते हैं कि आपकी शक्ति, आपका बल-पौरुष अनन्त है। फिर भी मनुष्योंका-सा आचरण करते हुए आपने हारनेका अभिनय किया। परन्तु इसीसे उसका घमंड बढ़ गया है। हे अजित! अब वह यह जानकर हमलोगोंको और भी सताता है कि हम आपके भक्त हैं, आपकी प्रजा हैं। अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये’॥ ३०॥✎ 1707

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1707 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्काम-भाव → निष्कामभाव

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