श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.70.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 70 · अथ सप्ततितमोऽध्यायः

जीवस्य यः संसरतो विमोक्षणं

न जानतोऽनर्थवहाच्छरीरतः।

लीलावतारैः स्वयशःप्रदीपकं

प्राज्वालयत्त्वा तमहं प्रपद्ये॥ ३९

jīvasya yaḥ saṃsarato vimokṣaṇaṃ

na jānato'narthavahāccharīrataḥ|

līlāvatāraiḥ svayaśaḥpradīpakaṃ

prājvālayattvā tamahaṃ prapadye|| 39

अर्थ

शरीर और इससे सम्बन्ध रखनेवाली वासनाओंमें फँसकर जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें भटकता रहता है तथा यह नहीं जानता कि मैं इस शरीरसे कैसे मुक्त हो सकता हूँ। वास्तवमें उसीके हितके लिये आप नाना प्रकारके लीलावतार ग्रहण करके अपने पवित्र यशका दीपक जला देते हैं, जिसके सहारे वह इस अनर्थकारी शरीरसे मुक्त हो सके। इसलिये मैं आपकी शरणमें हूँ॥ ३९॥✎ 2128

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2128 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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